कैलाश पर्वत के भीतर प्राचीन सभ्यताओं के लोग गहरी समाधि में आज भी जीवित हैं ?

कैलाश पर्वत तिब्बत में स्थित एक पवित्र और रहस्यमयी पर्वत है, जिसकी ऊँचाई लगभग 6638 मीटर है। यह हिंदू, बौद्ध, जैन और बोन धर्म के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है और हिंदू मान्यता के अनुसार यह भगवान शिव का निवास स्थान है।

एक वैज्ञानिक टीम ने विचित्र दावा किया । कहा कि कैलाश पर्वत अंदर से खोखला है और उसके भीतर प्राचीन सभ्यताओं के लोग गहरी समाधि में आज भी जीवित हैं। ये बातें इतनी तेजी से फैलीं कि इंटरनेट पर जब भी कोई “माउंट कैलाश” के बारे में खोज करता है, तो ऐसी रहस्यमयी कहानियाँ सबसे पहले सामने आती हैं। लेकिन सवाल यह है कि इन दावों में सच कितना है?

साल 1999 की बात है। रूस के एक डॉक्टर, एर्नेस्ट मुलदाशेव, अपनी एक वैज्ञानिक टीम के साथ तिब्बत की कठिन और रहस्यमयी यात्रा पर निकले। उनका उद्देश्य था दुनिया के सबसे रहस्यमय पर्वतों में से एक—कैलाश पर्वत—के बारे में सच्चाई जानना। कई हफ्तों तक बर्फीली घाटियों और ऊँचे पहाड़ों के बीच शोध करने के बाद जब वे रूस लौटे, तो उन्होंने ऐसे दावे किए जिन्होंने दुनिया भर में हलचल मचा दी।

मुलदाशेव ने कहा कि कैलाश पर्वत के आसपास समय सामान्य जगहों की तरह नहीं चलता। उनके अनुसार कुछ साल पहले चार साइबेरियन पर्वतारोहियों ने कैलाश पर चढ़ने की कोशिश की थी, लेकिन एक साल के भीतर ही वे चारों असामान्य रूप से बूढ़े हो गए और उनकी मृत्यु हो गई। उनकी टीम के एक सदस्य सर्गेई सेलिवेरस्टोव ने तो यहाँ तक कहा कि कैलाश पर्वत वास्तव में एक “टाइम मशीन” की तरह है, जहाँ समय अलग ढंग से व्यवहार करता है और इंसान की उम्र तेजी से बढ़ने लगती है। कुछ लोगों ने यह भी दावा किया कि कैलाश के आसपास रहने पर बाल और नाखून असामान्य रूप से तेजी से बढ़ने लगते हैं।

डॉक्टर मुलदाशेव ने एक और विचित्र दावा किया। उन्होंने कहा कि कैलाश पर्वत अंदर से खोखला है और उसके भीतर प्राचीन सभ्यताओं के लोग गहरी समाधि में आज भी जीवित हैं। ये बातें इतनी तेजी से फैलीं कि इंटरनेट पर जब भी कोई “माउंट कैलाश” के बारे में खोज करता है, तो ऐसी रहस्यमयी कहानियाँ सबसे पहले सामने आती हैं। लेकिन सवाल यह है कि इन दावों में सच कितना है?

तिब्बत के पश्चिमी भाग में स्थित कैलाश पर्वत भारत-चीन सीमा से लगभग सौ किलोमीटर दूर है। इसकी ऊँचाई लगभग 6638 मीटर है, जो माउंट एवरेस्ट से करीब 2200 मीटर कम है। लेकिन इसकी सबसे अनोखी बात इसकी आकृति है। दूर से देखने पर यह पर्वत एक विशाल पिरामिड जैसा दिखाई देता है। इसकी ढलानें इतनी तीखी हैं कि कई जगहों पर बर्फ भी टिक नहीं पाती।

कैलाश पर्वत को लेकर सबसे अद्भुत बात यह है कि यह केवल एक पर्वत नहीं, बल्कि चार अलग-अलग धर्मों की आस्था का केंद्र है। हिंदू धर्म में इसे भगवान शिव और माता पार्वती का निवास स्थान माना जाता है। हजारों वर्षों से श्रद्धालु मानते आए हैं कि कैलाश ही वह दिव्य स्थान है जहाँ शिव ध्यान में लीन रहते हैं। पुराणों में एक प्रसिद्ध कथा भी मिलती है कि एक बार रावण अपने अहंकार में कैलाश पर्वत को ही उठाकर लंका ले जाना चाहता था। जब उसने पर्वत को उठाने की कोशिश की, तो भगवान शिव ने केवल अपने पैर का अंगूठा दबाया और रावण हजारों वर्षों तक पर्वत के नीचे दबा रहा।

बौद्ध धर्म में भी कैलाश का विशेष महत्व है। यहाँ यह माना जाता है कि बुद्धत्व से जुड़े देवता चक्रसंवर अपनी शक्ति वज्रवाहरी के साथ इसी स्थान पर ध्यान करते हैं। जैन धर्म में इसे “अष्टापद” कहा जाता है, जहाँ पहले तीर्थंकर ऋषभदेव ने तपस्या करके मोक्ष प्राप्त किया था। और तिब्बत का प्राचीन बोन धर्म तो कैलाश को वह स्थान मानता है जहाँ स्वर्ग और पृथ्वी का मिलन होता है।

इन चारों धर्मों के लोग हजारों वर्षों से कैलाश पर्वत की परिक्रमा करते आए हैं। पर्वत के चारों ओर लगभग 52 किलोमीटर का मार्ग है जिसे तीर्थयात्री पवित्र यात्रा के रूप में पूरा करते हैं। हिंदू और बौद्ध लोग इस परिक्रमा को घड़ी की दिशा में करते हैं, जबकि बोन धर्म के अनुयायी इसे विपरीत दिशा में करते हैं।

यदि आप कैलाश पर्वत को ऊपर से देखें तो इसके पास दो झीलें दिखाई देती हैं—मानसरोवर और राक्षस ताल। दोनों झीलें एक-दूसरे के बिल्कुल पास हैं, उनके बीच की दूरी मुश्किल से दो-तीन किलोमीटर है। लेकिन दोनों का स्वभाव बिल्कुल अलग है। मानसरोवर का पानी मीठा है, उसमें मछलियाँ और पौधे भी पाए जाते हैं। दूसरी ओर राक्षस ताल का पानी अत्यधिक खारा है और वहाँ जीवन लगभग नहीं के बराबर है। लोगों की मान्यता है कि मानसरोवर देवताओं का स्थान है और राक्षस ताल राक्षसों का।

कहा जाता है कि रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए राक्षस ताल के किनारे कठोर तपस्या की थी। लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार इसका कारण बिल्कुल प्राकृतिक है। राक्षस ताल एक बंद झील है, जिसमें पानी बाहर निकलने का रास्ता नहीं होता। समय के साथ पानी तो वाष्पित हो जाता है, लेकिन उसमें मौजूद नमक और खनिज वहीं जमा होते रहते हैं, जिससे पानी अत्यधिक खारा हो जाता है। दूसरी ओर मानसरोवर में पानी का प्रवाह बना रहता है, इसलिए उसका पानी मीठा रहता है।

कैलाश पर्वत के आसपास से एशिया की चार बड़ी नदियाँ भी निकलती हैं—सिंधु, सतलुज, ब्रह्मपुत्र और कर्णाली। ये नदियाँ करोड़ों लोगों के जीवन का आधार हैं। एक ही पर्वतीय क्षेत्र से इतनी महत्वपूर्ण नदियों का निकलना भूगोल की दृष्टि से भी अत्यंत अद्भुत माना जाता है।

लेकिन इन सब बातों के बावजूद कैलाश के रहस्य यहीं समाप्त नहीं होते। इसकी पिरामिड जैसी आकृति को देखकर कुछ लोगों ने दावा किया कि यह प्राकृतिक पर्वत नहीं बल्कि किसी प्राचीन उन्नत सभ्यता द्वारा बनाया गया एक विशाल पिरामिड है। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि कैलाश के नीचे “शम्भाला” जैसी रहस्यमयी नगरी छिपी हुई है।

सबसे चर्चित दावा समय से जुड़ा है। कहा जाता है कि कैलाश के पास समय अलग तरह से चलता है और यहाँ कुछ घंटों में ही वह बदलाव हो जाता है जिसे सामान्य परिस्थितियों में हफ्तों लगते हैं। लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से यह दावा सही नहीं माना जाता। आइंस्टाइन की सापेक्षता सिद्धांत के अनुसार समय पर प्रभाव केवल दो चीजें डाल सकती हैं—अत्यधिक गति और अत्यधिक गुरुत्वाकर्षण। कैलाश पर्वत पर इन दोनों में से कोई भी स्थिति मौजूद नहीं है।

फिर भी एक सवाल हमेशा लोगों के मन में आता है—जब दुनिया के सबसे ऊँचे पर्वत माउंट एवरेस्ट पर हजारों लोग चढ़ चुके हैं, तो कैलाश पर्वत पर आज तक कोई क्यों नहीं चढ़ पाया?

साल 1926 में ब्रिटिश खोजकर्ता ह्यू रटलेज ने कैलाश पर चढ़ने की कोशिश की थी। उन्होंने पर्वत के उत्तर भाग को देखकर लिखा कि इसकी दीवार लगभग सीधी और बेहद खतरनाक है। वे लगभग 5486 मीटर की ऊँचाई तक पहुँचे, लेकिन उसके आगे बढ़ना असंभव हो गया। उनके साथ आए कर्नल आर.सी. विल्सन ने दक्षिण दिशा से रास्ता खोजने की कोशिश की, लेकिन अचानक मौसम खराब हो गया और उन्हें भी वापस लौटना पड़ा।

दरअसल तकनीकी रूप से कैलाश पर चढ़ना पूरी तरह असंभव नहीं माना जाता। असली कारण कुछ और है—आस्था। दुनिया के महान पर्वतारोही भी इस पर्वत को पवित्र मानते हैं। 1985 में इटली के प्रसिद्ध पर्वतारोही राइनहोल्ड मेसनर को चीन सरकार ने कैलाश पर चढ़ने का प्रस्ताव दिया था। वे दुनिया के पहले व्यक्ति थे जिन्होंने 8000 मीटर से ऊँचे सभी 14 पर्वतों पर चढ़ाई की थी। लेकिन उन्होंने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। उनका कहना था कि कैलाश पर चढ़ना करोड़ों लोगों की आस्था का अपमान होगा।

साल 2001 में जब एक स्पेनिश पर्वतारोही को कैलाश पर चढ़ने की अनुमति मिली, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारी विरोध हुआ और अंततः चीन सरकार ने इस पर्वत पर चढ़ाई पर स्थायी प्रतिबंध लगा दिया।

आज भी कैलाश पर्वत वैसे ही खड़ा है—शांत, रहस्यमय और पवित्र। इंसान ने समुद्र की गहराइयों से लेकर अंतरिक्ष तक लगभग हर जगह अपनी विजय का झंडा गाड़ दिया है। लेकिन कैलाश के सामने पूरी मानवता ने एक अलग निर्णय लिया—इसे जीतना नहीं, बल्कि सम्मान देना।

शायद यही कैलाश का सबसे बड़ा रहस्य और सबसे बड़ा चमत्कार है। क्योंकि यह हमें याद दिलाता है कि दुनिया की हर चीज़ को जीतना जरूरी नहीं होता। कुछ चीजें केवल श्रद्धा और सम्मान के लिए होती हैं।

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