भारत में सैनिकों और पूर्व सैनिकों के सम्मान और कल्याण के लिए अनेक व्यवस्थाएँ की गई हैं। इन्हीं व्यवस्थाओं में एक महत्वपूर्ण व्यवस्था है कैंटीन स्टोर्स डिपार्टमेंट (CSD), जिसके माध्यम से सैनिकों और पूर्व सैनिकों को आवश्यक वस्तुएँ रियायती दरों पर उपलब्ध कराई जाती हैं। यह व्यवस्था केवल सुविधा नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति सैनिकों की निस्वार्थ सेवा के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक भी है।
लेकिन समय के साथ कुछ व्यवस्थाएँ ऐसी बन गई हैं जो अपने मूल उद्देश्य से भटकती हुई दिखाई देती हैं। CSD के माध्यम से कार खरीदने पर लागू रैंक आधारित मूल्य सीमा ऐसी ही एक व्यवस्था है, जिस पर आज पुनर्विचार की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
वर्तमान व्यवस्था क्या है
इस समय CSD के माध्यम से कार खरीदने के लिए एक न्यूनतम और अधिकतम मूल्य सीमा निर्धारित है, जो सैनिकों की रैंक के अनुसार अलग-अलग होती है।
उदाहरण के रूप में, कई श्रेणियों—विशेषकर जूनियर कमीशंड ऑफिसर्स (JCO) और अन्य रैंकों (OR)—के लिए कार खरीद की अधिकतम सीमा लगभग 20 लाख रुपये तक निर्धारित है, जबकि न्यूनतम सीमा लगभग 8 लाख रुपये के आसपास है।
पहली नज़र में यह व्यवस्था नियंत्रित और व्यवस्थित प्रतीत हो सकती है, लेकिन वास्तविकता में यह कई समस्याएँ पैदा कर रही है।
बदलते समय की नई आवश्यकताएँ
आज के दौर में सड़क सुरक्षा, परिवार की ज़रूरतें और यात्रा की परिस्थितियाँ पहले की तुलना में कहीं अधिक बदल चुकी हैं।
आधुनिक वाहनों में अब कई आवश्यक सुरक्षा सुविधाएँ होती हैं, जैसे—
- मल्टीपल एयरबैग
- एबीएस और ईएससी
- उन्नत ब्रेकिंग सिस्टम
- बेहतर क्रैश सेफ्टी रेटिंग
इन सुविधाओं से लैस वाहन अक्सर निर्धारित मूल्य सीमा से ऊपर चले जाते हैं। परिणामस्वरूप कई सैनिक और पूर्व सैनिक सुरक्षित और बेहतर विकल्प होने के बावजूद उन्हें खरीद नहीं पाते।
सेवा के बाद भी बनी रहती है सीमा
एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सेवानिवृत्त सैनिक, जिन्होंने अपना पूरा जीवन राष्ट्र की सेवा में समर्पित कर दिया, वे भी इस सीमा से बंधे रहते हैं।
सेवानिवृत्ति के बाद यदि कोई पूर्व सैनिक अपनी बचत या पारिवारिक आवश्यकता के अनुसार बेहतर वाहन खरीदना चाहता है, तो भी उसे उसी सीमा में रहना पड़ता है। यह स्थिति कई बार उन्हें असहज और सीमित महसूस कराती है।
समान अवसर का प्रश्न
यह भी ध्यान देने योग्य है कि CSD मूलतः एक कल्याणकारी व्यवस्था है, जहाँ विभाग विक्रेता की भूमिका निभाता है और सैनिक उपभोक्ता की भूमिका में होते हैं।
ऐसी स्थिति में समान अवसर और उपभोक्ता अधिकार का प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है। जब कोई व्यक्ति अपनी वैध आय या बचत से वाहन खरीदना चाहता है, तो केवल रैंक के आधार पर उसकी पसंद को सीमित करना कई लोगों को असमानता जैसा महसूस होता है।
संवैधानिक दृष्टि से भी विचारणीय
भारत का संविधान समानता के सिद्धांत पर आधारित है।
अनुच्छेद 14 प्रत्येक नागरिक को कानून के समक्ष समानता और समान संरक्षण का अधिकार देता है।
इसी प्रकार उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 भी लेन-देन में निष्पक्षता और भेदभाव-रहित व्यवस्था की बात करता है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या रैंक के आधार पर वाहन खरीद की सीमा तय करना इन सिद्धांतों की भावना के अनुरूप है।
सैनिक सम्मान और मनोबल का मुद्दा
सैनिकों का मनोबल केवल युद्धभूमि में ही नहीं, बल्कि उनके सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में भी सम्मान और गरिमा से जुड़ा होता है।
यदि उन्हें अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिले, तो यह उनके आत्मसम्मान और संतोष को भी बढ़ाता है।
इसलिए यह केवल वाहन खरीद का विषय नहीं है, बल्कि सैनिक सम्मान, सुरक्षा और समान अवसर से जुड़ा एक व्यापक प्रश्न है।
समाधान क्या हो सकता है
इस विषय पर कई पूर्व सैनिक संगठनों का मत है कि—
- CSD में कार खरीद पर लागू रैंक आधारित मूल्य सीमा समाप्त या पुनरीक्षित की जानी चाहिए।
- सैनिक और पूर्व सैनिक अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार वाहन चुनने के लिए स्वतंत्र हों।
- व्यवस्था का उद्देश्य सुविधा और सुरक्षा होना चाहिए, न कि अनावश्यक प्रतिबंध।
निष्कर्ष
भारत के सैनिक और पूर्व सैनिक केवल एक पेशेवर वर्ग नहीं हैं, बल्कि वे राष्ट्र की सुरक्षा और सम्मान के प्रतीक हैं। उनके लिए बनाई गई किसी भी व्यवस्था का मूल उद्देश्य सम्मान, सुविधा और समान अवसर होना चाहिए।
समय के साथ नीतियों की समीक्षा करना एक स्वस्थ प्रशासनिक प्रक्रिया है। यदि CSD में कार खरीद से जुड़ी वर्तमान व्यवस्था की पुनर्समीक्षा की जाती है, तो यह न केवल सैनिकों के हित में होगा बल्कि सरकार की “सैनिक कल्याण” के प्रति प्रतिबद्धता को भी और मजबूत करेगा।








